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बिहार के गौरव-7: जिन जख्मों की बदबू से लोग दूर भागते हैं, उनपर मरहम लगा इंसानों और बेजुबानों को देते हैं नया जीवन

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पटना23 मिनट पहलेलेखक: मनीष मिश्रा

22 मार्च को बिहार दिवस है। बिहार के निर्माताओं को उनके योगदान के लिए नमन करते हुए भास्कर ऐसी 10 शख्सियतों से रू-ब-रू करा रहा है, जो नई पहचान बने हैं। मिसाल बन रहे हैं। आज के हिसाब से नई पीढ़ी को जिनसे प्रेरणा मिल रही है। 7वें दिन, आज जानें कि एक बिहारी कैसे बन गया ‘बीमारों का मसीहा ’-

बेकसों की बेकसी को देख कर, जब नहीं अपने सुखों को खो सके।
तब चले क्या लोग सेवा के लिए, जब न सेवा पर निछावर हो सके।

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की प्रसिद्ध कविता की ये पंक्तियां उन लोगों पर फिट बैठती हैं, जो किसी आपदा में जब सेवा कर नाम कमाने की होड़ लगती है तो 4 आने का सामान देकर 10 आने की पब्लिसिटी कर लेते हैं। सोशल मीडिया पर खूब फोटो शेयर करते हैं, लेकिन इन सबसे अलग एक गुमनाम सेल्स मैन भी हैं, जिन्होंने बचपन से न जाने कितने आवारा पशु और सड़क पर तड़प रहे बीमार, बेसहारा लोगों का इलाज करा कर उन्हें नया जीवन दिया। जिन जख्मों की बदबू से लोग दूर भागते हैं, वहां पटना के राजीव नगर निवासी विवेक विश्वास मरहम-पट्‌टी लेकर पहुंच जाते हैं। अस्पताल ले जाकर अपनी देखरेख में तब तक इलाज कराते हैं, जब तक कि वह पूरी तरह से ठीक ना हो जाए।

सोच लिया था बड़ा होकर सेवा ही करूंगा
विवेक एक कंपनी में मार्केटिंग सेक्टर से जुड़े हैं। वह जब 10 साल के थे तभी से उनके अंदर सेवा की भावना पैदा हुई। सड़क पर जानवरों और बेसहारा इंसानों को देखकर उनका दिल पसीज जाता। वह लोगों का दर्द नहीं देख पाते थे। बचपन में ही वह स्ट्रीट डॉग और पशुओं के लिए घर से रोटी लेकर निकल जाते थे। उम्र के साथ सेवा की भावना का भी विस्तार होता गया। अब तो सेवा की भावना उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गई है। वह अपनी सैलरी से हर माह ऐसे लोगों के लिए मोटी रकम खर्च करते हैं, जो सड़क पर बेसहारा होते हैं। विवेक का कहना है कि उन्हें ऐसा कर आत्मसंतुष्टि मिलती है, जो पैसे से कभी नहीं मिल सकती। बड़ी बात यह है कि इस काम में विवेक के घर वाले भी पूरा सहयोग करते हैं, न कभी टोका न पैसे के लिए हाथ पकड़ा।

घायल जानवरों का करते हैं इलाज
विवेक का कहना है कि सड़क पर अक्सर ऐसे जानवर दिख जाते हैं जो या तो किसी गाड़ी की ठोकर से घायल हो जाते हैं या फिर अन्य कारणों से बीमार हो जाते हैं। ऐसे जानवरों पर नजर पड़ने के बाद विवेक के कदम थम जाते हैं। पशु के डॉक्टरों से बात कर उनका इलाज कराने के लिए ही वह पूरे पटना में जाने जाते हैं। विवेक का कहना है कि अब तक सैकड़ों जानवरों का इलाज कराकर उन्हें ठीक कराया है। एक स्ट्रीट डॉग किसी ने पैर की हड्‌डी तोड़ दी थी। डॉक्टरों से सलाह लेकर उसके पैर में प्लास्टर किए और आज वह पूरी तरह ठीक हो गया। विवेक ऐसे कई उदाहरण बताते हैं जो उनके उनके प्रति विश्वास को मजबूत करने का काम करता है।

लॉकडाउन में जानवरों को बांटते रहे खाना
जब पूरे देश में लॉकडाउन था, तब विवेक घूम-घूमकर जानवरों और इंसानों की मदद करते थे। पटना ही नहीं, पूरे प्रदेश में उनका नेटवर्क है। वह लोगों के सहयोग से परेशान बेहाल लोगों की मदद करते रहे। लॉकडाउन में वह घर नहीं बैठे, घर से खाने का सामान लेकर निकल जाते थे और सड़क पर कोई भी जानवर मिलता था, उसे खिलाते थे। विवेक का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें सेवा करने का मौका मिला और वह इंसानों के साथ जानवरों की सेवा किए। विवेक का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान इंसान से लेकर जानवर तक परेशान हो गए थे। इंसान घरों में कैद होकर रह गया था और जानवर भी सड़क पर भूख से तड़प रहे थे। ऐसे में विवेक जरूरतमंदों की मदद करने के लिए घूम रहे थे।

शरीर से आती है बदबू फिर भी साथ देते हें विवेक
विवेक का कहना है कि एक बार एक लड़का उन्हें गांधी मैदान के पास मिला था। पैर में घाव हो गया था, इलाज नहीं होने से हड्‌डी सड़ गई थी। शरीर से इतनी दुर्गंध आ रही थी कि कोई पास तक नहीं जाता था। लड़का अपने घर-परिवार के बारे में कुछ नहीं बता पा रहा था। सिर में चोट के कारण उसकी सोचने की शक्ति खत्म हो गई थी। विवेक को वह गांधी मैदान के पास मिला। विवेक ने पहले खुद से उसके पैरों की सफाई की और जब दुर्गंध कम हुआ तो सरकारी एम्बुलेंस से उसे PMCH ले गए। इलाज में पैर काटना पड़ा, लेकिन वह आज पूरी तरह से स्वस्थ है। विवेक का कहना है कि उसे चलते हुए देख कर उन्हें काफी संतुष्टि मिलती है। गांधी मैदान और पटना जंक्शन के पास से ऐसे दर्जनों लोगों को वह हॉस्पिटल पहुंचाए हैं, जिन्हें कोई पूछने वाला नहीं था। शरीर से कितना भी दुर्गंध क्यों न आता हो विवेक को सेवा के आगे न तो संक्रमण से डर लगता है और न ही पैसा खर्च होने का कोई मलाल होता है। वह किसी से कोई मदद भी नहीं लेते हैं और न ही कोई सरकारी फंड। सब कुछ अपनी व्यवस्था से करते हैं। विवेक का कहना है कि अगर हर कोई एक दूसरे की इसी तरह से मदद करे तो इससे बड़ी संतुष्टि कभी नहीं मिल सकती है।

HIV संक्रमित की जान बचाई
भारत में संपूर्ण लॉकडाउन था। सड़क पर बिना पास निकलना मुश्किल था। इस बीच राजीव नगर की एक महिला को रात में प्रसव पीड़ा हुई। कोई साधन नहीं मिल रहा था कि वह अस्पताल तक पहुंच सके। सरकारी एम्बुलेंस को फोन किया गया, लेकिन लंबी प्रक्रिया के कारण देरी हो रही थी। महिला की हालत हर पल बिगड़ रही थी, जानकारी विवेक तक पहुंची तो वह ई रिक्शा लेकर घर पहुंच गए। महिला को कुर्जी हॉस्पिटल ले जाया, थोड़ी देर में बेटी पैदा हुई। लॉकडाउन के दौरान ही एक HIV संक्रमित की तबीयत खराब हुई तो घर वालों ने बाहर निकाल दिया। विवेक ने PMCH पहुंचाकर उसकी जान बचाई। एक-दो नहीं, ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं, जो राजीव नगर के विवेक को बीमारों का मसीहा बनाते हैं।

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