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‘नरसंहार’- राजनीति-मीडिया का शब्द, कानूनी किताब में नहीं: लालू शासन में एक साथ 3 मर्डर भी नरसंहार क्यों, अभी 5 में भी क्यों नहीं- तर्क जानिए

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पटना33 मिनट पहलेलेखक: बृजम पांडेय

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मधुबनी में एक ही परिवार के 5 की गोलियों से भून हत्या के बाद एक बार फिर बिहार में एक शब्द खूब चर्चा में रहा- नरसंहार। विपक्ष ने इसे नरसंहार करार दिया, जबकि सत्तापक्ष ऐसा मानने को तैयार नहीं। विपक्ष इस सामूहिक हत्या को नरसंहार कह रहा है, जबकि सत्तापक्ष के अनुसार यह आपसी विवाद में हत्या है। बिहार में इस सदी में जवान होने वाले ‘नरसंहार’ शब्द से न केवल परिचित हैं, बल्कि सेनारी, लक्ष्मणपुर-बाथे, बारागांव, मियांपुर का नाम गिनाने भी लगते हैं लेकिन 2000 के बाद जन्म लेने वालों को यह शब्द बार-बार चौंका रहा है। सवाल उठ रहा है कि नरसंहार की परिभाषा आखिर है क्या? भास्कर ने कानून के जानकारों, मीडियाकर्मियों, पुलिस के आला अधिकारियों और राजनीतिज्ञों से इसपर कई राउंड में बहस की। सामने बस इतना आया कि कानून की किताब या पुलिस की डिक्शनरी में ‘नरसंहार’ है ही नहीं, यह मूलत: राजनीति और मीडिया का शब्द है। तो, इस स्टोरी के जरिए हम इस शब्द और बिहार से इसके जुड़ाव को ठीक से याद करते हैं।

पुलिस की डिक्शनरी और कानून की किताब में कहीं नहीं
बिहार में विपक्ष ने भले ही इसे नरसंहार का नाम दिया, लेकिन सत्ताधारी दल जवाब देने में विपक्ष से आगे नजर आ रहा है। विपक्ष मधुबनी में एक ही परिवार के 5 की हत्या को नरसंहार कह रहा है तो सत्तारूढ़ जनता दल यूनाईटेड (JDU) बाकायदा लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के शासनकाल के 118 कांडों को ‘नरसंहार’ के रूप में चिह्नित कर 859 लोगों की मौत की सूची पेश कर रहा है। भास्कर ने इस बारे में बिहार के DIG स्तर के तीन अफसरों के साथ दो पूर्व DGP तक से पूछा। हरेक ने कहा कि मुद्दा गरम है, नाम नहीं छापिए मगर ‘नरसंहार’ की कोई सूची अबतक नहीं बनी है। पिछली सदी में कई जिलों के SP रहे चुके एक रिटायर्ड IPS ने तो यह भी कहा कि यह शब्द उस जमाने के अखबारों ने गढ़ा था। पुलिस थानों में अनुसंधान के क्रम में कुछ पुलिसकर्मी 4 या अधिक हत्या एक साथ होने पर इसे नरसंहार लिख भी देते थे, लेकिन इस शब्द को कभी पुलिस महकमे में मान्यता नहीं मिली।

JDU-RJD की परिभाषा को उनके शब्दों में जानिए
नरसंहार शब्द को लेकर महासंग्राम सत्तारूढ़ JDU और मुख्य विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) में मचा हुआ है, इसलिए भास्कर ने इन दोनों ही दलों से इसकी परिभाषा पूछी। JDU के प्रवक्ता और MLC नीरज कुमार ने कहा- “ऐसी सामूहिक हत्या, जिसका कोई प्रत्यक्षदर्शी सूचक नहीं हो, आंखों देखा गवाह न हो, डर से कोई गवाही देने के लिए तैयार नहीं हो- उसे ही नरसंहार कह सकते हैं।” नीरज इसे उदाहरण से भी समझाते हैं कि अगर मधुबनी में भी डर से कोई सूचक नहीं बनता और सोए हुए में यह हत्याएं होतीं तो मान लिया जाता, लेकिन यहां आपसी विवाद साफ है न कि जातीय या कोई सामूहिक दुश्मनी है। दूसरी तरफ, RJD के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह कहते हैं कि “जब कई लोग एक साथ मारे जाएं तो उसे नरसंहार कहते हैं। यह सामूहिक हत्या है। मारे जाने वालों की संख्या 5-10 से लेकर 100-200 भी हो सकती है। जब क्रोध या आवेश में परिवार भर को मार दिया जाए तो वह नरसंहार है।” RJD इसी आधार पर मधुबनी की घटना को नरसंहार कह रहा है।

पटना के बेलछी में 1977 में 14 की सामूहिक हत्या से यह शब्द निकला

JDU ने 1990 से 2005 तक के लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के शासनकाल में बिहार में 118 नरसंहारों की सूची बनाकर रखी है। उस सूची में 3 लोगों की सामूहिक हत्याओं को भी नरसंहार में रखा गया है तो तर्क यही है कि रात के अंधेरे में हुई हत्याकांडों के डर से कोई सूचक सामने नहीं आया था। दरअसल, वह दौर वर्ग संघर्ष का था। जाति संघर्ष का। माले के विरोध में रणवीर सेना ने अपनी कमर कसी थी। MCC की तरफ से अगड़ी जाति के लोगों की हत्या की जाती थी तो रणवीर सेना की तरफ दलित समुदाय के लोगों की सामूहिक हत्याएं की जाती थीं। वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि 1976 के आसपास से सामूहिक संघर्ष-हत्या का दौर शुरू हुआ और 1980 के बाद से यह लगातार बढ़ता गया।कुछ महीनों के बाद गोलियों की गूंज बिहार के किसी ना किसी कोने से आ ही जाती थी। कहा जाता है कि 1977 में पटना जिले के बेलछी गांव में 14 दलितों की हत्या से इस ‘नरसंहार’ शब्द ने बिहार में जगह बनाई थी।

अब रूह कंपाने वाले उस दौर का भी GK जान लीजिए
एक नजर बिहार के उन बड़े नरसंहारों पर जिसकी दहशत आज भी है। उस जमाने में सोशल मीडिया नहीं था और न इंटरनेट की पहुंच वैसी थी, फिर भी देश में बिहार के इन नरसंहारों को लोग जानते हैं।

  • सेनारी नरसंहार : 18 मार्च 1999 को जहानाबाद के सेनारी में 34 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था। MCC के 4-5 सौ लोगों ने सेनारी गांव को चारों ओर से घेर लिया था। 40 लोगों को खींचकर गांव से बाहर निकाला गया। उसके बाद बारी-बारी से एक-एक का गला काट दिया गया और पेट चीर दिया गया। 34 लोग मारे गए थे। 6 किसी तरह से बच गए थे। यह गांव भूमिहारों का था।
  • बारा गांव नरसंहार : गया जिले के बारा गांव में 12 फरवरी 1992 को अगड़ी जाति के 35 लोगों की गला रेतकर हत्या कर दी गई थी। टिकारी प्रखंड के इस गांव में नक्सली संगठन MCC के सैकड़ों हथियारबंद उग्रवादियों ने गांव पर हमला कर 35 लोगों का गला रेत दिया था।
  • बथानी टोला नरसंहार : 11 जुलाई 1996 को रणवीर सेना ने भोजपुर जिले के बथानी टोला गांव में दलित, मुस्लिम और पिछड़ी जाति के 22 लोगों की हत्या कर दी थी। रणवीर सेना ने बारा गांव नरसंहार का बदला लेने के लिए ये हत्याएं की थीं।
  • लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार : यह बिहार के नरसंहारों में सबसे बड़ा और नृशंस नरसंहार माना जाता है। यह लालू प्रसाद के शासनकाल में हुआ था जिसमें बच्चों और गर्भवती महिलाओं को भी निशाना बनाया गया था। 1 दिसंबर 1997 की रात हुए लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार में 58 दलितों की हत्या कर दी गई थी। इस नरसंहार को कथित रूप से रणवीर सेना ने अंजाम दिया था।
  • शंकर बिगहा नरसंहार : 25 जनवरी 1999 की रात बिहार के जहानाबाद जिले में हुए शंकर बिगहा नरसंहार में 22 दलितों की हत्या कर दी गई थी। बताया गया था कि इस घटना को भी रणवीर सेना ने ही अंजाम दिया था, लेकिन बाद में जो आरोपी बनाए गए थे उन्हें साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया था।
  • मियांपुर नरसंहार : औरंगाबाद जिले के मियांपुर में 16 जून 2000 को 35 दलित लोगों की हत्या कर दी गई थी।

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