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छत्तीसगढ़ के पूर्व DGP से बातचीत: कश्मीर में तीन-चार आतंकी हमला करते हैं, नक्सली 250 से 300 की संख्या में पहाड़ पर होते हैं, वहां आर्मी भी लगा दो तो भी बचना मुश्किल होता है

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नई दिल्ली15 मिनट पहलेलेखक: रवि यादव

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छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों पर हुआ हमला नया नहीं है। छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी विश्वरंजन कहते हैं कि मार्च-अप्रैल के महीने ऐसे हमलों के लिए मुफीद होते हैं। आखिर बार-बार क्यों चूक होती है और हमारे जवान हमले का शिकार होते हैं। विश्वरंजन कहते हैं कि’ नक्सलियों को स्थानीय लोगों का संरक्षण प्राप्त है। सरकार को अधिक फोर्स लगाकर इसे खत्म करना होगा।’ दैनिक भास्कर ने छत्तीसगढ़ के नक्सली हमले को लेकर उनसे विशेष बातचीत की। पेश है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश…

छत्तीसगढ़ में हुए नक्सली हमले पर आपका क्या कहना है?

ऐसी हिंसा कई बार हुई है इसमें कुछ नया नहीं है। हां, इस बार सुरक्षाबलों पर हमला काफी दिनों बाद हुआ है। एक बार तो CRPF के 75 जवान मारे गए थे। अगर आप एम्बुश में फंस गए तो उससे निकलना आसान नहीं होता। यहां पर ऊंचे पहाड़ हैं, जहां से आक्रमण होता है । जम्मू कश्मीर में जब एनकाउंटर होते है तब तीन चार आतंकी वार करते हैं । लेकिन, नक्सली हमले में 250 से 300 की संख्या में हमला करते हैं।

इस प्रकार की घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है क्या इंटेलिजेंस की कमी रही है।

इंटेलिजेंस होने के बाद भी पुलिस फंसती है क्योंकि नक्सलियों को पहाड़ी के ऊपर से दिखाई देता है कि पुलिस आ रही है फिर 200 से 300 नक्सली एम्बुश लगा देते हैं। आप आर्मी भी लगा दो अगर वहां एम्बुश लगा है तो वहां से बचकर निकलना मुश्किल है

आपके अनुसार पूरे मामले में चूक कहां हुई है।
हम चूक नहीं मानते हैं क्योंकि अगर उनसे लड़ना है तो ये रिस्क तो आपको लेना ही पड़ेगा।

आपका वहां बतौर DGP लंबा अनुभव रहा है। आपके अनुसार नक्सलवाद को कैसे खत्म किया जा सकता है ।
वहां पर आपको ज्यादा से ज्यादा एम्बुश करना पड़ेगा और आपको उन्हें मारने के लिए तैयार होना पड़ेगा। अटैक को मजबूर करना ही पड़ेगा।

अक्सर मार्च व अप्रैल में नक्सली हमला करते हैं। इसकी क्या वजह मानते हैं?

ऐसी कोई वजह नहीं है। उस समय जगह खुली रहती है। बरसात में पुलिस मूवमेंट्स नहीं होता और नक्सली मूवमेंट भी नही होती। ऐसे में वे एंबुश प्लान करते हैं।

नक्सलियों के साथ मुठभेड़ के बाद सुरक्षा बलों को अपने साथी जवानों के शव तक उठाने में मुश्किल आ रही है क्योंकि पहाड़ियों से नक्सली जब तब फायरिंग शुरु कर देते हैं।

नक्सलियों के साथ मुठभेड़ के बाद सुरक्षा बलों को अपने साथी जवानों के शव तक उठाने में मुश्किल आ रही है क्योंकि पहाड़ियों से नक्सली जब तब फायरिंग शुरु कर देते हैं।

आपकी ओर से सरकार को क्या सुझाव है?

मैं वहां 11 साल रहकर बहुत सुझाव दे चुका हूं ।ये समझना पड़ेगा कि युद्ध में कितने लोग मरते हैं । ये भी एक युद्ध है। पाकिस्तान जब करगिल में बैठा हुआ था, तब हमारी सेना के काफी लोग मरे थे । पाकिस्तान के 50 लोगों ने नाक में दम कर दिया था क्योंकि वो पहाड़ पर थे और हमारी सेना नीचे। यही हाल छत्तीसगढ़ में हमले के समय होता है।

नक्सलवाद जैसी ताकतें देश को कमजोर करने का काम कर रही है। क्या सरकार को और ठोस कदम उठाने की जरुरत है।
सरकार को इस लड़ाई को जारी रखना है और फोर्स को ज्यादा से ज्यादा बढाना है अगर वो 300 है तो आपको 400 रखने पड़ेंगे। जब मैं वहां था तो राशन के लिए 300 से 400 गाड़ियां चलती थी, उसमें 500-700 फ़ोर्स साथ चलती थी तो कभी सामान नहीं लुटा था। इस इलाक़े को नक्सलवाद ने 1982 से अपने क़ब्ज़े में लिया हुआ है ।

1982 से अब तक अड़तीस साल में हमारी फोर्स को कामयाबी नहीं मिलने की क्या वजह मानते हैं।
उस समय फोर्स की कमी रही थी क्योंकि तब केवल मध्य प्रदेश ही राज्य था। फोर्स की समस्या छत्तीसगढ़ बनने के बाद हल हुई है ।

कुछ दिनों पहले नक्सलियों ने अपनी ओर से सरकार को शर्तों के साथ बातचीत का न्योता दिया था इस पर आप क्या कहेंगे?
ऐसा नहीं होता है क्योंकि कल को तो आतंकवादी ये कहेंगे कि कश्मीर हमको दे दो। शर्तों पर बातचीत नहीं हो सकती ।

आपकी नज़र में इसका क्या हल हो सकता है
इस क्षेत्र में ज़्यादा फ़ोर्स लगाई जाये । देश में संविधान है । ऐसा कभी नहीं होता कि कोई कुछ भी मांगे और वो उसे दे दिया जाये । नक्सलियों ने पेपर पर ये साफ कर दिया है कि भारत में भारतीय संविधान को हटा कर माओवादि राज स्थापित करना ही उनका मक़सद है । उनका ये भी कहना है कि ये सब एक लम्बे युद्ध से ही सम्भव हो सकता है ।

नक्सली अपनी नई भर्ती कैसे करते हैं।
ये तो बच्चों से शुरुआत करते हैं। बच्चों को शुरू से ही सब सिखाया जाता है ।

हमारे घायल जवानों ने बताया है कि कई नक्सली भी मारे गये है लेकिन नक्सली अपना नुकसान छुपाते है ऐसा क्यों ?
उनके 300 आदमी लडते हैं और गांव वाले मदद करते हैं । जैसे ही कोई नक्सली मरता है तो वो दो चीजें बचाते हैं । एक शव को और दूसरा हथियार को । जहां नक्सली का शव जायेगा वहां समाधि बनती है । हमारी फोर्स के साथ कोई अतिरिक्त बल नहीं चलता कि हम शवों को उठा पाएं। जब तक लड़ाई चलती रहती हैं हम लड़ते रहते है ।

नक्सल हमले में शहीद हुए सुरक्षा बलों के शव उनके घर भेजे जा रहे हैं। ये तस्वीर बीजापुर की है।

नक्सल हमले में शहीद हुए सुरक्षा बलों के शव उनके घर भेजे जा रहे हैं। ये तस्वीर बीजापुर की है।

क्या वहां के स्थानीय लोगों को समझाने की जरूरत है।
वो काम भी चलता है। मेरे समय में गांव-गांव जाकर बातचीत करते थे। इससे नक्सली चिढ़े हुये थे कि हम गांव गांव में मीटिंग क्यों कर रहे है। वो सब अब भी होता है। लेकिन लोग डरे हुए हैं। बंदूक से सबको डर लगता है ।

क्या नक्सलवादियों ने वक़्त के साथ टेक्नोलॉजी भी बदली है।
खास नहीं। बहुत दिनों से वही टेक्नोलॉजी उनके पास है । रॉकेट लांचर व हथियार बहुत पहले से है ।

नक्सलियों को हथियार कहां से सप्लाई होता है?
ये डाका डालते हैं। कुछ सालो पहले उड़ीसा पुलिस लाइन में घूस कर तीन हजार हथियार लूट लिये थे। फोर्स पर हमला करके उनके हथियारों को भी उठा ले जाते हैं। काफी समय से यही कर रहे हैं ।

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