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कोरोना साइडइफेक्ट: लॉकडाउन के दौरान लेड पॉयजिनिंग का शिकार हो रहे लाखों बच्चे

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एक दिन पहले

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  • अमेरिका में विशेषज्ञों ने चेताया, लाखों बच्चों को हो सकता है स्थायी नुकसान
  • घरों में सस्ते लेड वाले पेंट लगाने से बच्चे में परमानेंट न्यूरोलॉजिकल डैमेज

वाशिंगटन. कोरोना लॉकडाउन का बच्चों पर एक बेहद खतरनाक साइ़डइफेक्ट सामने आया है। अमेरिका में लॉकडाउन के चलते बच्चों में सीसा से होने वाली विषाक्तता यानी लेड पॉइजनिंग का जोखिम बहुत बढ़ गया है। अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) का अनुमान है कि इस दौरान खून की जांच न होने के चलते करीब एक लाख बच्चों के खून में सीसा खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है। घरों में इस्तेमाल होने वाले सस्ते पेंट से होने वाली लेड पॉइजनिंग के चलते बच्चों में सीखने की क्षमता विकसित न होना, व्यवहार संबंधी समस्याएं और शारीरिक विकास में देरी जैसी बड़ी दिक्कत हो सकती हैं।

सीडीसी में लेड पॉइजनिंग एंड एनवायर्नमेंटल हेल्थ ट्रैकिंग ब्रांच के सीनियर एपिडेमियोलॉजिस्ट डॉ. जोसेफ कर्टनी का कहना है कि हजारों बच्चों में लेड पायजिंनिंग की जांच नहीं हो सकी। इससे उनके जीवन में स्थायी नुकसान हो सकता है।

पिछले 50 सालों के दौरान अमेरिका के स्वास्थ्य अधिकारियों ने लाखों बच्चों को लेड पॉइजनिंग और इससे इससे होने वाली स्थायी तंत्रिका संबंधी क्षति (परमानेंट न्यूरोलॉजिकल डैमेज) से बचाने में बड़ी कामयाबी हासिल की है। 1970 के दशक के बाद से ऐसे बच्चों का प्रतिशत काफी कम हो गया है जिनके खून में सीसे का स्तर बहुत ज्यादा था। मगर 2020 में कोरोना ने इस उपलब्धि को भारी खतरे में डाल दिया। इस दौरान लॉकडाउन के चलते बच्चे अपने घर और डे केयर में बंद रहे। राष्ट्रीय आपात के चलते बच्चों में लेड स्क्रीनिंग और उनके इलाज की प्रक्रिया को बाधित कर दिया। स्वास्थ्य अधिकारी घर-घर जाकर बच्चों की स्क्रीनिंग यानी जांच और इलाज नहीं कर सके। जहां उन पर लेड पॉइजनिंग काफी खतरा बढ़ गया।

बच्चों के खून ऐसे पहुंचता है पेंट में मिला लेड
सीडीसी का अनुमान है कि 1978 में पाबंदी के बावजूद अमेरिका में दो करोड़ से ज्यादा घरों में लेड बेस्ड पेंट है। जब यह पेंट पुराना होने पर दीवारों या फर्निचर से छूटता है तो धूल के साथ मिलकर सांस के जरिए बच्चों के फेफड़ों और खून में मिल जाता है।

छोटे बच्चों को सबसे ज्यादा खतरा
लेड पॉइजनिंग का सबसे ज्यादा खतरा छोटे बच्चों को है, जिनके मस्तिष्क विकसित हो रहे होते हैं। नेशनल सेंटर फॉर हेल्दी हाउसिंग के मुख्य वैज्ञानिक डेविड जैकब्स का कहना है कि ज्यादातर बच्चों में लेड पॉइजनिंग लेड पेंट वाली धूल उनके हाथों या खिलौनों पर लगने से होती है, क्योंकि इस उम्र के बच्चों में हर चीज को अपने मुंह में ले जाने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।

कई राज्यों में लेड की जांच जरूरी
लेड पॉइजनिंग के खतरे की वजह से अमेरिका के कई राज्यों ने एक निश्चित उम्र के बच्चों में खून की जांच कराना जरूरी है। डॉक्टर आमतौर पर बच्चों के रुटीन चेकअप के तौर पर लेड पॉइजनिंग की जांच कराते हैं। लेकिन पिछले साल मार्च में जब महामारी ने दस्तक दी तो सभी को घर पर रहने के आदेश दे दिए गए। ज्यादातर अस्पताल बंद हो गए। बचे हुए डॉक्टरों ने वर्चुअल अपॉइंटमेंट से मरीजों को देखने लगे।

बहुत तेजी से कम हुई खून की जांच
मिनेसोटा डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक हेल्थ में सीनियर एपिडेमियोलॉजिस्ट स्टेफनी येंडेल कहते हैं कि वीडियो कॉल के जरिए आपको खून का नमूने तो नहीं मिल सकता। मार्च के महीने में लेड पॉइजनिंग की जांच 70% तक आ गई। अप्रैल में यह 43% रह गई। वहीं, न्यूयॉर्क में अप्रैल में 88% कम जांच हुई थी।

2% अमेरिकी बच्चों में लेड पॉइजनिंग, इनमें गरीब सबसे ज्यादा
अमेरिका में करीब 2% बच्चों के खून में लेड की मात्रा बढ़ी हुई रहती है। सीडीसी के सीनियर एपिडेमियोलॉजिस्ट जोसेफ कोर्टनी कहना है कि ज्यादातर वे बच्चे जांच से बचे रह गए जिन पर कोरोना का सबसे ज्यादा खतरा है। क्योंकि ये बच्चे ज्यादातर कम आय वर्ग वाले मकानों में रहते हैं। ऐसे में लेड युक्त पेंट से लेड पॉइजनिंग का सबसे ज्यादा जोखिम इन्हीं को है। इनमें सबसे ज्यादा अश्वेत बच्चे हैं।

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