अन्तराष्ट्रीय

एक्सपर्ट्स का दावा: अटलांटिक महासागर की धारा 1600 वर्षों में सबसे कमजोर, इससे यूरोप में हीट वेव बढ़ रही, भारत में घटेगी मानसूनी बारिश

wcnews.xyz
Spread the love

  • Hindi News
  • International
  • Atlantic Ocean Current Weakest In 1600 Years, Increasing Heat Wave In Europe, Monsoon Rains Will Decrease In India

Ads से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

3 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक
यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के हालिया शोध के मुताबिक समुद्र के पंप कहे जाने वाले अटलांटिक मेरिडिओनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (एमॉक) की रफ्तार 1600 वर्षों में सबसे कम हो गई है। (सिंबोलिक फोटो) - Dainik Bhaskar

यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के हालिया शोध के मुताबिक समुद्र के पंप कहे जाने वाले अटलांटिक मेरिडिओनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (एमॉक) की रफ्तार 1600 वर्षों में सबसे कम हो गई है। (सिंबोलिक फोटो)

  • यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के समुद्र विज्ञान के विशेषज्ञ की चेतावनी

हम ग्लोबल वार्मिंग से जूझ रहे हैं। इसका असर तमाम प्राकृतिक गतिविधियों पर दिखने लगा है। यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के हालिया शोध के मुताबिक समुद्र के पंप कहे जाने वाले अटलांटिक मेरिडिओनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (एमॉक) की रफ्तार 1600 वर्षों में सबसे कम हो गई है। हम समुद्र को अलग अलग नाम से जानते हैं जैसे हमारे करीब अटलांटिक महासागर है और आप हिंद महासागर के करीब रहते हैं।

लेकिन प्रकृति के लिए सारे समुद्र एक ही हैं और पानी के सर्कुलेशन सिस्टम के माध्यम से सभी समुद्र आपस में जुड़े हैं। इसी जुड़ाव के कारण मौसम बनता है। यूरोप और कनाडा के बीच उत्तरी अटलांटिक महासागर में दक्षिण और पूर्व के समुद्र से गर्म पानी की धारा पहुंचती है और यहीं ग्लेशियर से पिघला पानी भी समुद्र में मिलता है। इसी सर्कुलेशन को एमॉक कहते हैं।

ये व्यवस्था तापमान और पानी के घनत्व में अंतर के कारण पैदा होती है। समुद्र में खारा पानी होता है जिसका घनत्व नदियों से आ रहे मीठे पानी से अधिक होता है। धरती के मध्य में, यानी इक्वेटर के करीब, गर्मी ज्यादा होती है इसलिए यहां के समुद्र का पानी तेजी से गर्म होता है, लेकिन आर्कटिक और अंटार्कटिका के पास समुद्र का पानी ठंडा होता है। ठंडा खारा पानी समुद्र की गहराई में उतरने लगता है और उसकी जगह को भरने के लिए सतह का गर्म पानी बहने लगता है।

इसी सर्कुलेशन के कारण सारे समुद्र आपस में जुड़े हैं। इसी सिस्टम से गर्मी और सर्दी का संतुलन बनता है। हवाओं की दिशा और उनकी तासीर बनती है। मानसूनी बारिश भी इसी सिस्टम के बनने की वजह से होती है। इसी कारण समुद्र की गहराइयों में निर्मित हो रहे पोषक तत्व ऊपर आते हैं जिनपर मछलियां निर्भर हैं और मछलियों पर धरती की एक बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था निर्भर है। इतना ही नहीं, वातावरण में घुल रहा 90% कार्बन डाइऑक्साइड समुद्र सोखता है और समुद्र की यह क्षमता भी सर्कुलेशन सिस्टम से ही संभव हो पाती है।

अब इस सिस्टम की रफ्तार धीमी होती जा रही है। इसकी वजह मानवनिर्मित विकास है, क्योंकि इस सर्कुलेशन के धीमे पड़ने का समय 19वीं शताब्दी में शुरू हुई औद्योगिक क्रांति से मैच करता है। जैसे-जैसे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती गई, इसकी रफ्तार घटती चली गई है। एमॉक के थमने की वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इसका मीठा पानी समुद्र की ऊपरी सतह पर तैर रहा है। गर्म पानी के संपर्क में आने से यह जल्दी गर्म हो रहा है।

यानी जिस गर्म पानी को ग्लेशियर के पास आकर ठंडा होना चाहिए वो पानी को गर्म कर रहा है। लिहाजा समुद्री सतह गर्म हो रहे हैं। गर्मी के दिन बढ़ रहे हैं। यूरोप में हीट वेव की घटनाएं बढ़ रही है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। भारत सूख रहा है और सूखता चला जाएगा। मानसून की दिशा भी दक्षिण की ओर बदलती चली जाएगी।

इसकी वजह से उत्तरी भारत के मैदानी इलाके सूखने लगेंगे और रेगिस्तानी क्षेत्रों में बारिश ज्यादा होने लगेगी। अगर सर्कुलेशन की रफ्तार धीमी होती चली गई तो भारत में खड़े हो कर आप मानसून को हिंद महासागर में बरसते हुए देख सकेंगे लेकिन भारतीय तट सूखे रह जाएंगे। भोजन सुरक्षा के लिए ये सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकता है।

(यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के प्रो. डॉ. डेविड थॉर्नेली ने जैसा रितेश शुक्ल को बताया)

खबरें और भी हैं…

Source link

WC News
the authorWC News

Leave a Reply